एकांत कारावास में सात दिन: बिना घड़ी, बिना लोगों के एक सफ़ेद कमरे में जिमी का अनुभव

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अवलोकन

इस वीडियो में जिमी (MrBeast) यह परखने निकलते हैं कि क्या कोई इंसान पूरे 168 घंटे, यानी सात दिन, एक साउंडप्रूफ़ सफ़ेद कमरे में बिना किसी इंसानी संपर्क के रह सकता है। शुरुआत में यह एक अजीब और कुछ हद तक मज़ेदार प्रयोग लगता है। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, वीडियो समय का अंदाज़ा खोने, ऊब, भूख और अकेलेपन के असर का सिलसिलेवार रिकॉर्ड बन जाता है। आख़िर में जिमी खुद मानते हैं कि अगर उन्हें पता होता कि यह इतना मुश्किल होगा, तो वे यह कभी नहीं करते।

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चुनौती की शर्तें और डॉक्टर की चेतावनी

जिमी को सात दिन एक सफ़ेद, साउंडप्रूफ़ कमरे में रहना था, बिना किसी इंसानी संपर्क के। टीम ने इसे मानसिक रूप से ख़तरनाक माना, इसलिए एक डॉक्टर बाहर से उनकी हालत पर नज़र रख रहे थे। डॉक्टर बताते हैं कि उन्होंने तेईस साल मानसिक रोगियों के बीच काम किया है, और उनकी नज़र में यह स्थिति उससे भी कहीं ज़्यादा भयानक है।

वीडियो में बताया गया कि ऐसे सफ़ेद कमरे में पचास घंटे से ज़्यादा रहना स्थायी मनोवैज्ञानिक नुकसान कर सकता है, जबकि जिमी को 168 घंटे रहना था। यह भी कहा गया कि अगर वे आपा खोकर "साइकोसिस" जैसी स्थिति में पहुँच जाते, तो टीम को उन्हें बाहर निकालना पड़ता।

जिमी पहले सात दिन ज़मीन के नीचे दफ़न रह चुके हैं। जब डॉक्टर से पूछा गया कि क्या यह उससे भी मुश्किल है, तो उन्होंने कहा कि "बहुत मुश्किल", क्योंकि यहाँ कोई सामाजिक संपर्क नहीं है। डॉक्टर के मुताबिक़ जब दिमाग़ तक कोई जानकारी नहीं पहुँचती, तो पागलपन जैसी हालत पैदा होती है, जिसमें मतिभ्रम (हैलुसिनेशन) और पैरानोया भी शामिल हो सकते हैं।

कमरे में क्या था और खाना कैसे पहुँचता था

पूरे हफ़्ते के लिए जिमी के पास गिनी-चुनी चीज़ें थीं:

  • सोने के लिए एक बेड
  • एक नोटबुक और पेन
  • दोबारा भरी जा सकने वाली एक बोतल
  • टूथब्रश, टूथपेस्ट और साबुन
  • टॉयलेट वाला बाथरूम और पानी के लिए एक सिंक

खाना लगभग सौ फ़ुट लंबे कन्वेयर बेल्ट से आता था, ताकि किसी इंसान से आमना-सामना न हो। जिमी यह भी बताते हैं कि पूरा सेट धातु की ज़ंजीरों से बंद था। उन्हें यह ख़याल डराता था कि अगर सेट में आग लग जाए, तो दरवाज़ा खुलने से पहले ही वे ज़िंदा जल जाएँगे। फिर उन्होंने खुद ही इस बारे में सोचना छोड़ने का फ़ैसला किया।

पहले घंटे: टाइल्स की गिनती और भूख

जिमी को जल्दी समझ आ गया कि यहाँ अपना मन बहलाना बहुत मुश्किल होगा। नौवें घंटे के आसपास उन्होंने दीवारों की टाइल्स गिन डालीं। उनके हिसाब से दीवारों पर 1,900 टाइल्स थीं, और छत व फ़र्श मिलाकर कुल 2,860।

इससे भी बड़ी चिंता खाने की थी। करीब चौदह घंटे बीतने के अपने अनुमान पर वे कहते हैं कि समय अभी से लंबा लगने लगा है और अब तक खाना नहीं आया। वे सोचते हैं कि आने से पहले ज़्यादा खा लेना चाहिए था।

बाहर टीम जानबूझकर खाना अनियमित समय पर भेज रही थी, ताकि जिमी को वक़्त का पता न चले। मसलन, सुबह छह बजे के आसपास नाश्ता भेजा गया। लेकिन कमरा साउंडप्रूफ़ था, इसलिए जिमी को खाना आने की आवाज़ नहीं सुनाई दी। लगभग दो घंटे बाद जाँचने पर उन्हें पता चला। खाना ठंडा और पिलपिला था, फिर भी उन्होंने कहा कि कम से कम खाने को कुछ तो मिला।

उत्तेजना की कमी पर डॉक्टर की टिप्पणी

अगले कुछ घंटों में जिमी ने खुद को ज़्यादा से ज़्यादा व्यस्त रखने की कोशिश की। डॉक्टर ने देखा कि उनके पास वक़्त बिताने का कोई साधन नहीं है। उनका कहना था कि अगर बुनियादी स्टिमुलेशन की कमी में ही यह हाल है, तो उन्हें नहीं लगता कि जिमी सात दिन टिक पाएँगे।

डॉक्टर ने एक दिलचस्प बात भी कही: जब किसी से सब कुछ छीन लिया जाए, तो एक साधारण धातु की प्लेट भी आईफ़ोन जितनी मज़ेदार लगने लगती है। उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि इस बोरियत से जिमी जल्द ही चिड़चिड़े हो जाएँगे। उधर जिमी कह रहे थे कि उन्हें लगता है जैसे उनके भीतर का इंसान मर रहा है, और वे सोने चले गए।

समय का अंदाज़ा कैसे बिगड़ा

यहीं से वीडियो का केंद्रीय विषय सामने आता है: बाहर का समय और जिमी का अनुमान अलग-अलग होने लगते हैं। जिमी को लगा कि चालीस घंटे हो चुके हैं। टीम के अनुसार वे असल से छह घंटे आगे का समय मान रहे थे, और उस वक़्त दूसरे दिन के लगभग चार बज रहे थे। जिमी हैरान थे कि अभी नौ बजने चाहिए थे, चार कैसे बजे होंगे।

समय की गड़बड़ी से दूसरी दिक्कतें भी पैदा हुईं। जिमी को नींद नहीं आ रही थी और वे कहते हैं कि कमरे की रोशनी उनके दिमाग़ पर बहुत असर डाल रही है। डॉक्टर का आकलन था कि उन्हें नींद इसलिए नहीं आ रही क्योंकि शरीर को उसकी ज़रूरत नहीं है, वे बस सोकर वक़्त काटना चाहते हैं। डॉक्टर की राय में उन्हें जागते हुए कोई ऐसा काम करना चाहिए जिसमें ध्यान लगा रहे। जब जिमी दीवार पर चढ़ने की कोशिश करते दिखे, तो डॉक्टर ने कहा कि ऐसी जगह से आज़ाद होने की कोशिश करना इंसान के लिए स्वाभाविक है।

खाने के मामले में भी यही उलझन रही। पहला खाना बहुत ठंडा था और जिमी ने कहा कि वे इसे खाने के बजाय भूखे रहना पसंद करेंगे। फिर जब अगला खाना आया तो उन्हें लगा कि बस कुछ ही मिनट हुए हैं, और वे सोचने लगे कि क्या दोनों खाने होंगे। नैरेशन में वे बताते हैं कि यह दूसरे दिन का "दूसरा नाश्ता" था और उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि खाना कितनी देर से बेल्ट पर पड़ा था। डॉक्टर के मुताबिक़ यह हल्का पागलपन था, जो वक़्त के साथ बढ़ता जाएगा।

गिनती, बोरियत और एक नई तरह की बेचैनी

कुछ करने को न पाकर जिमी ने हज़ार तक गिनती की। डॉक्टर का कहना था कि जब करने को कुछ न हो, तो उस स्थिति को अपनाना ही पड़ता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बढ़ेगा, जिमी के पास करने को कुछ नहीं बचेगा। बाद में जिमी ने माना कि डॉक्टर बिल्कुल सही थे, क्योंकि आगे चलकर उनकी हद पार हो गई थी।

जिमी कहते हैं कि सोकर वक़्त काटने की उनकी रणनीति से समय तो कटा, लेकिन उससे दूसरी समस्याएँ भी पैदा हुईं। सोते रहने की वजह से एक बार खाना सात घंटे तक बेल्ट पर पड़ा रहा। उसके साथ आई आइसक्रीम पिघलकर बेकार हो चुकी थी और वे फिर भूखे रह गए।

इसी दौर में जिमी ने अपनी मनःस्थिति पर एक दिलचस्प बात कही। आम तौर पर वे एक साथ कई वीडियो पर काम करने की वजह से बहुत तनाव में रहते हैं। यहाँ वह तनाव नहीं था, लेकिन भारी बेचैनी थी कि बाहर दुनिया में कई अच्छी चीज़ें हो रही होंगी जो वे मिस कर रहे हैं। उन्होंने इसे एक अलग भावना बताया जिसकी उन्हें आदत नहीं है, और कहा कि कुछ न कर पाना कितना मुश्किल होता है, यह अजीब है।

कल्पना का सहारा और 447 चावल के दाने

अपने हिसाब से पैंसठवें घंटे के आसपास जिमी सोचने लगे कि हाथों के बल कैसे खड़े होते हैं, और अफ़सोस जताया कि यहाँ आने से पहले उन्होंने इसकी बुनियादी बातें नहीं सीख लीं। डॉक्टर ने कहा कि अब उन्हें अपने दिमाग़ में ख़याल गढ़ने होंगे, ताकि वे गहरे डिप्रेशन में जाने से बच सकें।

जिमी ने ठीक यही किया। वे कल्पना करने लगे कि वे एक पार्क में टहल रहे हैं, जहाँ हरी घास है, कोई मछली पकड़ रहा है, आसमान साफ़ है और पंछियों की आवाज़ें आ रही हैं। फिर किसी चीज़ ने यह कल्पना तोड़ दी और वे बोले, "तुमने मेरा सपना बर्बाद कर दिया।" बाहर बैठी टीम का कहना था कि वे उन्हें पागल होते देख रहे हैं।

इसके बाद चावल, शकरकंद और स्टेक वाला खाना आया, जिसे जिमी ने अब तक का सबसे अच्छा खाना कहा। लेकिन उन्होंने कहा कि कोई आम इंसान इसे खा लेता, जबकि वे चावल के दाने गिनेंगे। उनकी गिनती में ट्रे में 447 दाने निकले।

आधा रास्ता, जो उन्हें पता ही नहीं चला

थकान महसूस होने पर जिमी ने मान लिया कि यह पाँचवें दिन की रात होगी। नैरेशन बताता है कि असल में चुनौती आधी भी नहीं हुई थी और वे पूरे एक दिन आगे का समय मान रहे थे। रोशनी से बचने के लिए उन्होंने बाथरूम पर परदे लगा दिए, जिसे वे अपनी अब तक की सबसे समझदारी भरी चाल बताते हैं। वे उस बाथरूम में लगातार बारह घंटे सोए।

84 घंटे पर, यानी आधिकारिक रूप से आधे रास्ते पर, टीम ने जिमी को यह बात खाने के ज़रिए बताने की योजना बनाई। उन्होंने अक्षरों वाला पास्ता (स्पघेटीओस) भेजा, जिसके अक्षर जोड़कर संदेश पढ़ा जा सकता था। जिमी पहले तो यह पहचान ही नहीं पाए कि यह क्या है और इसे सॉस वाला कोई रोल समझ बैठे। एक "N" दिखने पर भी उन्होंने अक्षर अलग करने के बजाय उन्हें खा लिया। टीम हैरान थी कि उन्होंने अक्षर देखे कैसे नहीं। जिमी ने खुद ही मज़ाक में कहा कि उम्मीद है इनसे कोई शब्द नहीं बनाना था जिससे ज़्यादा खाना मिलता। टीम का कहना था कि बाहर आकर यह देखने पर वे खुद को बहुत बेवकूफ़ समझेंगे।

भूख, बीस मिनट की खुशी और फिर डिप्रेशन की लहर

इस समय तक तेज़ रोशनी जिमी को बहुत परेशान कर रही थी। उनके सिर में दर्द था और भूख बहुत लग रही थी। डॉक्टर का कहना था कि पर्याप्त कैलोरी मिलने के बावजूद उनका शरीर और खाना माँग रहा है, क्योंकि वे बहुत कम उत्तेजित महसूस कर रहे हैं और यह कमी भूख जैसी लगती है। जिमी बार-बार जाँचते रहे कि खाना आया या नहीं। ख़ाली समय में उन्होंने कमरे में घूमना भी आज़माया, फिर यह सोचकर रुक गए कि इससे चक्कर आ सकते हैं।

फिर मैकडॉनल्ड्स का एक बैग आया। हल्का होने की वजह से उन्हें डर था कि कहीं यह ख़ाली न हो, लेकिन उसमें सच में खाना था। जिमी बताते हैं कि जब भी खाना मिलता है, उन्हें बीस मिनट की असली खुशी मिलती है और वे फिर से इंसान जैसा महसूस करते हैं। लेकिन खाना ख़त्म होते ही डिप्रेशन की एक लहर आ जाती थी और सवाल उठता था कि अब क्या करें। उनके शब्दों में हर पल बिताना बहुत मुश्किल हो गया था और उन्हें लग रहा था कि उनका दिमाग़ धीरे-धीरे बेवकूफ़ी की ओर बढ़ रहा है।

व्यस्त रहने के लिए उन्होंने चीज़बर्गर के रैपर और टूथब्रश वाले कप से बास्केटबॉल का खेल बनाया। फिर एक कांटे और प्लेट से "बेसबॉल" जैसा खेल खेलने और चीज़ें दूर फेंकने की कोशिश की। फिर भी नतीजा वही रहा: "मैं बोर हो गया हूँ।"

"चौथा दिन" और कैमरों पर ग़ुस्सा

जिमी को लग रहा था कि अब बस दो दिन बचे हैं, लेकिन नैरेशन में बताया गया कि यह चौथा दिन था। पहले ही उन्होंने टीम से कह रखा था कि वे चाहे जितना चिल्लाएँ, भीख माँगें या विनती करें, उन्हें समय से पहले बाहर न निकाला जाए।

अपने अनुमान से वे 113 घंटे पूरे कर चुके थे और मान रहे थे कि सिर्फ़ 55 घंटे बचे हैं। उन्होंने वीडियो एडिट करने वाले से कहा कि असल बचा हुआ समय दिखाया जाए। टीम का अंदाज़ा था कि सच जानकर वे ग़ुस्सा होंगे।

इसी दौर में जिमी का ध्यान बार-बार कैमरों पर गया। उन्होंने पूछा कि क्या इंसान को प्राइवेसी भी नहीं मिल सकती, और कहा कि चौबीसों घंटे उन पर कैमरे लगे हैं, इससे वे पागल हो जाएँगे। उन्होंने कन्वेयर पर कुछ फेंकने का "जीनियस" आइडिया आज़माया, उसे बॉलिंग की तरह फेंका और इसमें अपनी उँगली ज़ख़्मी कर बैठे। वे कहते हैं कि उन्होंने सच में नहीं सोचा था कि यह वीडियो इतना मुश्किल होगा, और उन्हें अब एक जानवर जैसा महसूस हो रहा है, जैसे उनके सारे इंसानी अधिकार छिन गए हों।

अपना हिसाब लगाने की कोशिश

अपने अंदाज़े से पाँचवें दिन के बीच में जिमी ने कहा कि उन्हें अपनी गर्लफ्रेंड और अपनी टीम की याद आ रही है, "यहाँ तक कि नोलन की भी।" मानसिक रूप से वे अपनी हद तक पहुँच चुके थे और इसे "बहुत अमानवीय" बता रहे थे। वे इतने समय से वहाँ थे कि सपनों में भी खुद को उसी कमरे में देखते थे, सोचते थे कि यह पाँचवाँ-छठा दिन है, और फिर जागकर पता चलता था कि वह सपना था। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बस समय बता दिया जाए तो वे बहुत पैसे दे देंगे।

फिर जिमी ने अपने इस अनुमान के कारण गिनाए कि चुनौती में 33 घंटे बचे हैं:

  • वे अब तक पाँच बार सो चुके हैं।
  • वे आम तौर पर दिन में एक बार टॉयलेट जाते हैं और यहाँ आने के बाद पाँच बार जा चुके हैं।
  • उनकी गर्दन पर उतने बाल उग आए हैं जितने आम तौर पर एक हफ़्ते में उगते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर किसी वजह से यह पाँचवाँ दिन निकला, और भगवान न करे चौथा दिन, तो वे अपना आपा खो देंगे।

एक सपने में उन्होंने एक लाख तक गिनती की थी, इसलिए जागकर उन्होंने तय किया कि कमरे के हज़ार चक्कर लगाएँगे। बाद में फ़ुटेज देखते हुए वे बताते हैं कि यह सब दिमाग़ को ठिकाने पर रखने के लिए था। चक्कर शुरू करते ही उन्हें लगा कि हज़ार बहुत ज़्यादा है, क्योंकि सिर घूमने लगा था। अंत में उन्होंने माना कि मनोरंजन के लिए सब कुछ आज़मा लिया, पर कुछ काम नहीं कर रहा।

बेली और सूज़ी का "बदला"

चक्कर ख़त्म होने के बाद कार्ल "100 दिन एक साथ फँसे हुए" वाली चुनौती से दो प्रतिभागियों, बेली और सूज़ी, को ले आए। उन्हें जिमी का हाल दिखाते हुए कहा गया कि यह उस आदमी का चेहरा है जिसने तुम्हें सौ दिन क़ैद में रखा था। तुलना के सवाल पर सूज़ी ने कहा कि अगर वे वहाँ होतीं, तो चाहतीं कि उनके साथ कोई हो। ग़ौरतलब है कि उनकी चुनौती में लोग साथ थे, जबकि जिमी पूरी तरह अकेले थे।

इस बार बाज़ी पलट चुकी थी और सफ़ेद कमरे में जिमी थे। बेली और सूज़ी ने बदले के तौर पर कन्वेयर से एक ख़ाली ट्रे भेज दी और कहा कि उन्हें बिल्कुल बुरा नहीं लग रहा, जिमी इसी लायक़ हैं। जिमी ने अंदाज़ा लगाया कि यह कार्ल का काम है और बार-बार कहते रहे, "तुम ऐसा नहीं कर सकते।" बाहर से कहा गया कि अब उन्हें बहुत तकलीफ़ होने लगी है। फिर भी जिमी ने ख़ुद माना कि शायद वे इसी लायक़ हैं।

सबसे अंधेरा दौर

इस हिस्से में जिमी के विचार और गहरे होते जाते हैं। वे सोचते हैं कि अगर मरने के बाद इंसान हमेशा के लिए ऐसे ही सफ़ेद कमरे में चला जाता हो, तो वह कितना बुरा होगा। वे बताते हैं कि सोते समय वे खुद को बाहर की दुनिया में देखते हैं और जागने पर अकेलेपन में डिप्रेस हो जाते हैं। इसलिए जितना ज़्यादा सोते हैं, उतना खुश रहते हैं।

अपनी पिछली चुनौतियों से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वे सात दिन राफ़्ट पर बिता चुके हैं, सात दिन ज़िंदा दफ़न रह चुके हैं, और अब सात दिन एकांत कारावास में। उनके मुताबिक़ अगर उन्हें पता होता कि यह इतना मुश्किल होगा, तो वे इसे कभी नहीं करते। उन्होंने यह भी कहा कि अगर स्क्रीन के ऊपर बाएँ कोने में दिखने वाला घंटों का आँकड़ा बीस से थोड़ा भी ज़्यादा निकला, तो वे आपा खो देंगे। उन्होंने बहुत अकेलापन महसूस होने और गर्लफ्रेंड की याद आने की बात दोहराई और इसे "बस टॉर्चर" कहा।

बाहर टीम सवाल कर रही थी कि क्या वे रो रहे हैं। उनका कहना था कि जिमी की हालत ठीक नहीं है: वे ज़मीन पर सो रहे हैं, चीज़ें फेंक रहे हैं, ग़ुस्सा कर रहे हैं और खाना मिलने पर बिल्कुल बच्चे की तरह खुश हो जाते हैं।

आख़िरी दिन: आठ घंटे का भ्रम

जिमी मान रहे थे कि अब बस आठ घंटे बचे हैं, फिर दरवाज़ा खुलेगा और वे आज़ाद होंगे। टीम के मुताबिक़ वे सोच रहे थे कि आख़िरी कुछ घंटे सो रहे हैं, जबकि असल में 24 घंटे बचे थे। टीम ने कहा कि सच का अहसास होने पर उनका दिल टूट जाएगा, और उन्होंने इसे गंभीर स्थिति माना।

जिमी ने यह सोचकर एक खाने को "आख़िरी खाना" कहा और उसका आनंद लिया कि अगले दो-तीन घंटों में दरवाज़ा खुल जाएगा। फिर उन्होंने कमरे की सफ़ाई शुरू की और माना कि वे सफ़ाई का बहाना कर रहे हैं, असल में बस ऊब चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद थी इस प्रयोग से मानसिक स्पष्टता मिलेगी और शायद वे अपने बारे में कुछ सीखेंगे। लेकिन असल में वे बस यह हुनर लेकर जा रहे हैं कि कन्वेयर बेल्ट के दरवाज़े में चीज़ें कैसे फेंकी जाती हैं, "या शायद वह भी नहीं।"

कुछ समय बाद उन्होंने ज़िद के साथ कहा कि ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता कि चौबीस घंटे से ज़्यादा बचे हों, वे यहाँ और चौबीस घंटे नहीं रह सकते, उनकी हद हो चुकी है, और वे यह मानने से इनकार करते हैं। फिर उन्होंने वक़्त काटने के लिए दोबारा गिनती शुरू की और 5,425 तक पहुँचे। एक बार उन्हें लगा कि बाहर कोई आवाज़ सुनाई दी है। फिर वे बार-बार दोहराते रहे "मैं दुखी हूँ" और "मुझे यहाँ से बाहर निकालो।"

बाहर से टीम ने कहा कि वे मुश्किल से इंसान लग रहे हैं: बेड पर लेटे हैं, आँखें ढकी हैं, कोई उत्तेजना नहीं। उन्हें चिंता थी कि बाहर आकर जिमी कैसा बर्ताव करेंगे, क्या वे बदले हुए इंसान होंगे, या ऐसे इंसान बन जाएँगे जो कुछ भी करने लायक़ नहीं बचा। टीम ने कहा कि उन्होंने आज तक किसी वीडियो में जिमी पर इतना दबाव नहीं डाला, क्योंकि इस बार उनका इंसानी संपर्क पूरी तरह तोड़ दिया गया था।

बाहर निकलना

आख़िर में टीम ने तय किया कि जिमी को बहुत आराम से जगाया जाए, जैसे किसी बच्चे को जगाते हैं। उन्हें बताया गया कि बस दस मिनट बचे हैं। उलटी गिनती के बीच जिमी को याद आया कि उन्होंने पैंट नहीं पहनी है। दरवाज़ा खुलने पर उन्होंने माफ़ी माँगी कि वे पैंट पहन रहे थे।

बाहर आकर उन्होंने बताया कि उनका सिर थोड़ा हल्का लग रहा है। उन्होंने कहा कि यह अजीब है, लेकिन इस चुनौती के बाद वे भूल गए हैं कि लोगों से कैसे मिलते हैं। आँखों के सामने वह तेज़ रोशनी न होने से उन्हें अच्छा लग रहा था और बाहर की छत भी उन्हें "कमाल की" लगी। उन्होंने माना कि उन्हें लग रहा था वे आख़िरी चौबीस घंटे कभी ख़त्म नहीं होंगे। वे सूरज देखना चाहते थे, लेकिन बाहर निकलने पर अँधेरा था। फिर भी उनका कहना था कि बाहर की दुनिया देखकर अच्छा लग रहा है।