दुनिया भर में दस स्कूल: मिस्टर बीस्ट की टीम ने घाना से भारत तक क्या बनाया

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अवलोकन

इस वीडियो में मिस्टर बीस्ट (जिमी) और उनकी टीम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दस स्कूल बनाने या उन्हें पूरी तरह नया करने निकलते हैं। शुरुआत में वे बताते हैं कि 20 करोड़ से ज़्यादा बच्चों को स्कूल नसीब नहीं है, इसलिए उन्होंने खुद यह काम उठाने का फैसला किया। उनके मुताबिक योजना सिर्फ इमारतें खड़ी करने तक सीमित नहीं थी। वे बच्चों के खाने का इंतज़ाम भी करना चाहते थे, ताकि बच्चे अवैध मज़दूरी वाले खेतों का शिकार न बनें और उन्हें गंदा पानी न पीना पड़े। वीडियो घाना से शुरू होकर मैक्सिको-क्षेत्र के एक कस्बे, इक्वाडोर, अमेरिका और आखिर में भारत तक जाता है। हर जगह स्कूल के साथ पानी, खाना, आवास, पुल या बस जैसी कोई न कोई ज़रूरत भी जुड़ी हुई दिखती है।

11 मिनट में पढ़ें

घाना का पहला स्कूल: सरकार ने जिसे गिराने का आदेश दिया था

पहला स्कूल घाना में है। जिमी जिस पुरानी इमारत के सामने खड़े हैं, उसके बारे में वे साफ़ करते हैं कि वह उनकी बनाई नहीं है, बल्कि वही पुराना स्कूल है जिसे बदलना है। उनके अनुसार यह इमारत इतनी खतरनाक थी कि सरकारी अधिकारियों ने खुद इसे ध्वस्त करने का आदेश दे रखा था। टीम ने पुराना ढांचा गिराया और उसकी जगह नया स्कूल बनाया। बच्चों को नया स्कूल दिखाया गया। साथ ही स्कूल के पास एक नया बोरवेल भी खोदा गया।

दूसरा स्कूल: 250 बच्चे, दो नए क्लासरूम और शिक्षकों के लिए घर

दूसरे स्कूल को गिराने की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए टीम ने उसे अंदर से पूरी तरह नया कर दिया। सबसे पहले दीवारें पेंट की गईं, फिर नई छत, नई दीवारें और नया फ़र्श लगाया गया। जिमी के मुताबिक यहाँ 250 बच्चे ऐसी हालत में पढ़ने को मजबूर थे। मौजूदा कक्षा को ठीक करने के अलावा दो बिल्कुल नए क्लासरूम भी बनाए गए। बच्चों को पहली बार ये कमरे दिखाए गए तो उनकी भीड़ देखकर जिमी ने कहा कि 250 बच्चों वाली बात झूठ नहीं थी।

वीडियो में यह भी बताया गया कि इनमें से कुछ बच्चों ने ज़िंदगी में कभी किसी खिलौने से नहीं खेला था, और अब वे इधर-उधर घूमकर मज़े कर रहे थे। जिमी का अनुमान है कि इससे स्कूल में उपस्थिति भी बढ़ेगी और बच्चों को पढ़ाई में ज़्यादा मज़ा आएगा।

इसी स्कूल में एक और समस्या सामने आई। प्रिंसिपल ने टीम को बताया कि दो शिक्षक, जोसेफ़ और इम्मानुएल, रोज़ आने-जाने में अपनी तनख्वाह का एक-तिहाई हिस्सा खर्च कर देते हैं और स्कूल पहुँचने में उन्हें एक घंटा लगता है। टीम ने दोनों के लिए स्कूल के पास नए आवास बनाए। दोनों को अलग-अलग अपार्टमेंट मिले, उन्हें कुछ भी साझा नहीं करना पड़ेगा।

नदी का पानी, परजीवी कीड़े और पाँच साल का मुफ़्त लंच

जिमी बताते हैं कि जब टीम पहली बार यहाँ आई थी, तब उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। पिछले दस सालों से एक नदी ही यहाँ पीने के पानी का एकमात्र स्रोत थी। वीडियो के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत लोगों की आंतों में, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, परजीवी कीड़े हैं। इसलिए यहाँ बोरवेल खोदा गया, ताकि सिर्फ बच्चों को नहीं, बल्कि सभी लोगों को साफ़ पानी मिल सके।

पानी के साथ शौचालय भी बनाए गए, ताकि लोगों को जंगल में न जाना पड़े। वहाँ सिंक भी लगाए गए जहाँ से साफ़ पानी मिलेगा। इसके अलावा एक पूरी तरह सुसज्जित रसोई बनाई गई, ताकि बच्चों को रोज़ दोपहर का खाना मिल सके। जिमी ने घोषणा की कि अगले पाँच साल तक हर दिन सभी छात्रों को मुफ़्त लंच मिलेगा। उन्होंने एक व्यक्ति से कैलेंडर पर कोई तारीख चुनने को कहा। 2030 चुना गया, और जिमी ने कहा कि मई 2030 तक मुफ़्त लंच मिलता रहेगा। यह खबर बच्चों को सुनाई गई तो वे "मिस्टर बीस्ट" के नारे लगाने लगे। जिमी ने इस काम में मदद के लिए रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन को धन्यवाद दिया।

खर्च के बारे में जिमी बताते हैं कि सिर्फ इस एक परिसर पर, किसी और स्कूल पर नहीं, पाँच लाख डॉलर से ज़्यादा खर्च हो चुके हैं। पूरा ब्लूप्रिंट अभी बाकी है और उसे पूरा करने में उनके अनुमान से दस लाख डॉलर से ज़्यादा लगेंगे। उनका कहना है कि यह स्कूल आने वाली कई पीढ़ियों की ज़िंदगी बदलेगा। इतना काम करने की वजह से स्थानीय लोगों ने उन्हें "चीफ़ ऑफ़ डेवलपमेंट" की उपाधि दी। एक स्थानीय व्यक्ति ने उनसे कहा कि जिमी जो कहते हैं, वो करके दिखाते हैं।

गिरने की कगार पर खड़ी छत और सौर ऊर्जा वाला कुआँ

अगले स्कूल में जिमी ने बच्चों को कमरा खाली करने को कहा और बताया कि यह इमारत उनसे भी पुरानी है और इसकी छत कभी भी गिर सकती है। बच्चे पढ़ रहे हों और छत गिर जाए, यह उन्हें सबसे बुरी स्थिति लगी। इसलिए पुरानी इमारत गिरा दी गई। जिमी के अनुसार इस खतरे से बचने का एक ही रास्ता था, पुराने स्कूल की जगह बिल्कुल नया दो-मंज़िला स्कूल बनाना। स्कूल का आकार दोगुना हो गया। अब इसमें आठ बड़ी, पूरी तरह फ़र्निश्ड कक्षाएँ हैं और 300 से ज़्यादा बच्चे पढ़ सकते हैं।

स्कूल के ठीक बगल में सौर पैनलों से चलने वाला एक कुआँ भी बनाया गया, जिसमें पानी जमा करने की सुविधा है। जिमी ज़ोर देकर कहते हैं कि यह पानी सिर्फ स्कूल के लिए नहीं, आस-पास रहने वाले सभी लोगों के लिए है, क्योंकि उनका मकसद सिर्फ स्कूल बनाना नहीं, लोगों की ज़िंदगी में बदलाव लाना है।

बाल मज़दूरी और फ़ीस्टेबल्स का संदर्भ

यहीं वीडियो घाना के काम को बाल मज़दूरी के सवाल से जोड़ता है। जिमी के अनुसार इन बच्चों को स्कूल देने का मतलब है कि उन्हें अवैध बाल मज़दूरी में नहीं धकेला जाएगा। वे बताते हैं कि फ़ीस्टेबल्स (उनका चॉकलेट ब्रांड) किसानों को इतनी कीमत देने के लिए प्रतिबद्ध है जिससे वे अच्छी ज़िंदगी जी सकें, और अपने खेतों में बाल मज़दूरी का ऑडिट करने के लिए भी। इसी वजह से, वीडियो में कहा गया, उन्होंने घाना में 11 अलग-अलग जगहों पर बच्चों के लिए स्कूल बनाए। (यह संख्या वीडियो के दस स्कूलों वाले ढांचे से अलग है, लेकिन वीडियो में यही कहा गया है।)

बाढ़ और कीचड़ वाली कक्षा की जगह सात नए क्लासरूम

इसके बाद जिमी कहते हैं कि वे सिर्फ बाल मज़दूरी की समस्या पर काम नहीं कर रहे। अगला स्कूल इतना खराब था कि वहाँ पढ़ाई ही संभव नहीं थी। बारिश में कक्षा में बाढ़ आ जाती थी और अंदर पानी भरने से पूरा कीचड़ हो जाता था। अगले कुछ महीनों में टीम ने वहाँ सात क्लासरूम वाला नया स्कूल खड़ा कर दिया, जिसमें बिल्कुल नई डेस्क लगाई गईं। हमेशा की तरह बच्चों को उद्घाटन के दिन तक स्कूल देखने नहीं दिया गया।

यहाँ आठ महीने पहले टीम ने पुराने स्कूल के लिए एक रसोई बनाई थी, और अब से पाँच साल तक हर स्कूल-दिवस पर बच्चों को मुफ़्त लंच मिलेगा। एक व्यक्ति ने जिमी से कहा कि और क्लासरूम चाहिए होंगे क्योंकि बहुत से बच्चों को खाना चाहिए। जिमी का जवाब था कि इसीलिए तो सात बनाए गए हैं।

एक साल पुराना भोजन कार्यक्रम और दस क्लासरूम वाला स्कूल

अगले पड़ाव पर वह स्कूल भोजन कार्यक्रम है जिसे टीम ने एक साल पहले शुरू किया था। जिमी के अनुसार एक साल बाद सब ठीक चल रहा है। हर स्कूल-दिवस पर बच्चों को मुफ़्त लंच मिलता है, और इस कार्यक्रम के कारण स्कूल की उपस्थिति दस प्रतिशत बढ़ गई है।

जिमी बताते हैं कि यहाँ की कक्षा की हालत देखकर उन्हें लगा कि नया स्कूल बनाना ही एकमात्र इलाज है। टीम ने एक, दो या तीन नहीं, पूरे दस क्लासरूम बनाए, और वे स्पष्ट करते हैं कि इन दस क्लासरूम को मिलाकर यह वीडियो के दस स्कूलों में से सिर्फ एक स्कूल गिना गया है। बच्चे "न्यू क्लास!" चिल्लाते हुए अंदर गए। जिमी का कहना है कि अगर ये क्लासरूम न बनते तो बच्चे रोज़ डर के साये में पढ़ते, और अब वे बिना चिंता के पढ़ सकेंगे।

कस्बे का पहला स्कूल: कार से काम करती प्रिंसिपल

इसके बाद टीम एक ऐसे कस्बे में पहुँचती है जहाँ, वीडियो के अनुसार, पूरे कस्बे को मिडिल स्कूल से लेकर हाई स्कूल तक एक ही स्कूल साझा करना पड़ता है। हालत यह थी कि प्रिंसिपल को कार में बैठकर काम करना पड़ता था।

यहाँ निर्माण का तरीका जिमी के लिए भी नया था। हर दीवार अलग से बनाकर फिर उन्हें आपस में जोड़ा गया। जिमी ने माना कि उन्हें उम्मीद थी कि हथौड़े और कीलों से काम होगा। दीवारें जल्दी खड़ी हो गईं, लेकिन एक साथी ने याद दिलाया कि यह अभी सिर्फ ढांचा है और इसमें कंक्रीट भरना बाकी है। फिर जिमी और लगभग 50 स्वयंसेवकों ने मिलकर छत के हिस्से उठाकर ऊपर बिठाए। इस दौरान हँसी-मज़ाक भी चलता रहा, जैसे "फेंकना नहीं, सेट करना है" और यह कि नोलन उतने लंबे नहीं हैं। जिमी ने छत को काफ़ी भारी बताया। उनके अनुसार यह "नेक्स्ट जेन" निर्माण सामग्री है जिसमें कंक्रीट भरा जाएगा, और उसके बाद यह स्कूल कई पीढ़ियों तक मज़बूती से खड़ा रहेगा।

जब बाकी टीम कंक्रीट से दीवारें मज़बूत कर रही थी, तब जिमी ने प्रिंसिपल से बात की। प्रिंसिपल ने पुष्टि की कि वे दस साल से कार से ही काम कर रही हैं क्योंकि उनके पास कोई दफ़्तर नहीं है। टीम ने नए स्कूल के ठीक बगल में उनके लिए एक दफ़्तर बनाया। इसे देखकर प्रिंसिपल भावुक हो गईं। आख़िरी सरप्राइज़ के रूप में एक फ़ुटबॉल मैदान भी बनाया गया। जिमी ने इसमें मदद के लिए टेलीविसा फ़ाउंडेशन को धन्यवाद दिया।

इक्वाडोर: जंगल के भीतर दो ऊँचे स्कूल और नया पुल

जिमी ने इक्वाडोर के स्कूलों को शायद सबसे मुश्किल बताया। ये दो स्कूल घने जंगल में हैं, जहाँ लोगों को सब कुछ खुद करना पड़ता है और, जिमी के अनुसार, कोई मदद नहीं पहुँचती। वहाँ पहुँचने के लिए टीम को दो हवाई यात्राएँ करनी पड़ीं, फिर तीन घंटे नाव से जाना पड़ा और उसके बाद डेढ़ घंटे ऑफ़-रोड सफ़र करना पड़ा।

वहाँ पहुँचकर टीम ने समझा कि बारिश कैसे बच्चों की पढ़ाई रोक देती है। एक शिक्षिका ने बताया कि बारिश में पढ़ाना असंभव था। टिन की छतों पर बारिश के शोर की वजह से किसी की आवाज़ सुनाई नहीं देती थी। पानी घुटनों से ऊपर तक भर जाता था। शिक्षिका का कहना था कि अच्छी परिस्थितियों के बिना छात्र कुछ नहीं सीख सकते।

इसलिए टीम ने दोनों पुराने, जर्जर स्कूलों की जगह दो बिल्कुल नए ऊँचे (एलिवेटेड) स्कूल बनाए, जो खास तौर पर छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किए गए थे। वीडियो के अनुसार अब 50 से ज़्यादा बच्चे बेहतर परिस्थितियों में स्कूल लौट सकेंगे। इसके अलावा बच्चों के रास्ते पर पड़ने वाले खतरनाक लकड़ी के पुल की जगह ठोस धातु का पुल बनाया गया, ताकि उन्हें स्कूल जाते समय डरना न पड़े।

अमेरिका: न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों के लिए खुले में सीखने की जगह

अमेरिका में टीम होप क्रीक एकेडमी पहुँची, जो न्यूरोडाइवर्जेंट ज़रूरतों वाले छात्रों का स्कूल है। स्कूल के एक प्रतिनिधि ने बताया कि वे बच्चों को सुरक्षित माहौल में बढ़ने और उत्कृष्टता हासिल करने का मौका देने की कोशिश करते हैं।

जिमी का तर्क है कि इन छात्रों के लिए सीखने की सबसे अच्छी जगह कक्षा के अंदर नहीं, स्कूल के बाहर है। वे कहते हैं कि डेटा के मुताबिक न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चे बंद कमरे की तुलना में खुली जगह और प्रकृति के बीच बेहतर सीखते हैं। इसी आधार पर उन्होंने लोवेज़ के साथ मिलकर एक आउटडोर लर्निंग सेंटर बनाया। वीडियो के अनुसार लाल जैकेट पहने लोग लोवेज़ के कर्मचारी थे जो अपने खाली समय में स्वयंसेवा कर रहे थे। एक सहभागी ने बताया कि यह बच्चों के लिए एक नया माहौल होगा, जो अभी उनके पास नहीं है, जहाँ वे प्रकृति के साथ खेल सकें। यहाँ एक प्ले हाउस भी बनाया गया।

वीडियो में लोवेज़ के बारे में कहा गया कि उसने पिछले वीडियो में बताया गया एक करोड़ वर्ग फ़ुट जगह बदलने का लक्ष्य पूरा किया है, और इस साल वह देशभर में 2,000 से ज़्यादा प्रोजेक्ट और 2,00,000 से ज़्यादा स्वयंसेवी घंटों के लिए प्रतिबद्ध है। तैयार सेंटर देखकर एक शिक्षक ने कहा कि यह बहुत खुला और प्राकृतिक है और कल्पना और रचनात्मकता के लिए पूरी छूट देता है।

भारत: 400 छात्र, छह कमरे, और एक स्कूल बस

आख़िरी स्कूल भारत में है। यह इतना भीड़भाड़ वाला था कि छात्रों के पास पढ़ने की जगह ही नहीं थी। स्कूल की ओर से बताया गया कि उनके पास अपने क्लासरूम नहीं हैं। 400 छात्रों के लिए कुल कितने कमरे हैं, यह पूछने पर जवाब मिला कि छह। टीम ने यहाँ तीन-मंज़िला नया स्कूल बनाया।

वीडियो के अनुसार कई बच्चों को स्कूल पहुँचने के लिए अंधेरे में व्यस्त और खतरनाक सड़कों पर घंटों पैदल चलना पड़ता था। इसलिए, दसवें स्कूल के हिस्से के रूप में, टीम ने एक स्कूल बस भी खरीदकर दी। एक शिक्षिका ने कहा कि वे बहुत खुश हैं क्योंकि अब उनके छात्र, खास तौर पर लड़कियाँ, सुरक्षित रूप से स्कूल आ सकेंगी। बच्चे बस से नए स्कूल गए। स्कूल की ओर से फ़ाउंडेशन का आभार जताया गया कि उसने इतना बड़ा स्कूल बनाकर दिया।

कुल खर्च, पहुँच और आगे की उम्मीद

अंत में जिमी दर्शकों को सीधे संबोधित करते हैं। उनका कहना है कि ये बदलाव इसलिए संभव हुए क्योंकि लोग उनके वीडियो देखते हैं। उनके अनुसार दर्शकों की वजह से टीम इन दस स्कूलों पर तीन मिलियन डॉलर से ज़्यादा खर्च कर पा रही है, और ये स्कूल समय के साथ 18,000 से ज़्यादा छात्रों को शिक्षा देंगे। इसी पैसे से साफ़ पीने के पानी के लिए कुएँ बने और बसें और पुल सुरक्षित बनाए जा सके, जिनसे जिमी के मुताबिक मौजूदा लोगों के साथ आने वाली पीढ़ियों को भी फ़ायदा होगा।

जिमी यह उम्मीद जताकर वीडियो खत्म करते हैं कि यह बस शुरुआत है, उन्हें अभी बहुत कुछ करना है, और वे मिस्टर बीस्ट चैनल के ज़रिए इसी तरह लाखों ज़िंदगियाँ बदलना और बचाना चाहते हैं।